
शरीर की भागवत
- तिथि
- ४–११ अक्टूबर २०२६
- स्थान
- श्री माहेश्वरी भवन, श्री गंगानगर
७ दिवसीय आवासीय शिविर
शरीर ही हमारा मंदिर है, इसे समझें और स्वस्थ रखें। सात दिन तक एक दिनचर्या जीकर देखिए — और अपने डॉक्टर स्वयं बनिए।
अगला शिविर
४–११ अक्टूबर २०२६
श्री माहेश्वरी भवन, श्री गंगानगर
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शरीर की भागवत सात दिन का आवासीय शिविर है, रविवार से रविवार। इसमें प्रवचन सुनने से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि सात दिन तक एक निश्चित दिनचर्या जी कर देखी जाए — भोजन का समय, उसकी प्रकृति, नींद, प्राणायाम और मौन।
शिविर का उद्देश्य सात दिन में किसी रोग को समाप्त कर देना नहीं है। उद्देश्य यह है कि आप अपने शरीर को पढ़ना सीख जाएँ, और एक ऐसा आहार चार्ट लेकर लौटें जो आपके लिए लिखा गया हो।
शिविर पूरी तरह आवासीय है। बीच में आना-जाना क्रम तोड़ देता है, इसलिए पूरे सात दिन रुकना आवश्यक है।
आपकी स्थिति के अनुसार लिखा गया, घर लौटकर निभाने के लिए।
भार, बीपी और शर्करा — पहले दिन और छठे दिन, ताकि अंतर अनुमान पर न रहे।
भोजन बनाना सीखिए — जो घर पर न बन सके, वह चार्ट किसी काम का नहीं।
छठे दिन, दवा के विषय में मार्गदर्शन के लिए।
आवास साझा कक्षों में होता है — पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग। बिस्तर और स्वच्छता की व्यवस्था शिविर की ओर से रहती है।
भोजन पूर्णतः सात्विक रहता है — दिन में तीन बार, निश्चित समय पर। तीसरे दिन उपवास होता है, जिसमें जल, नींबू-शहद जल और आवश्यकता होने पर रस लिया जाता है।
प्रवेश यहाँ से
शिविर में जिन १३ व्याधियों पर विशेष रूप से कार्य होता है। अपनी स्थिति चुनिए और जानिए कि आहार-आधारित पद्धति उस पर कैसे काम करती है।
शिविर का एक दिन
शिविर में आने से पहले सबसे बड़ा प्रश्न यही होता है — वहाँ होगा क्या? पूरा दिनक्रम यहाँ है।
शरीर की वर्तमान स्थिति समझना
अनुभव
ये व्यक्तिगत अनुभव हैं। परिणाम हर व्यक्ति में भिन्न होते हैं।
सात दिन में सबसे बड़ा अंतर यह आया कि सुबह उठते ही भारीपन नहीं रहता। खाने का समय बदला, और नींद अपने आप सुधर गई।
शिविर में प्रतिदिन शर्करा नापी जाती थी, इसलिए अंदाज़े की जगह आँकड़ा सामने था। लौटकर मैंने अपनी रिपोर्ट अपने डॉक्टर को दिखाई और आगे का निर्णय उन्हीं के साथ लिया।
बीस साल से जेब में गोली रखता था। रात का भोजन जल्दी करने भर से जो अंतर आया, उसकी मुझे कल्पना नहीं थी।
सबसे अच्छी बात यह लगी कि किसी ने दवा छोड़ने को नहीं कहा। जो कहा गया वह था — अपने शरीर को देखना सीखिए।
घुटनों के कारण सीढ़ियाँ चढ़ना कठिन था। सूक्ष्म व्यायाम और भोजन में बदलाव — दोनों साथ चले, और तीन महीने में फ़र्क़ दिखा।
आश्रम में गंगा किनारे के सात दिन — मौन, प्राणायाम और सादा भोजन। मन का बोझ भी उतरा।
सहयोग
शिविर आपकी अपनी सहयोग राशि से चलता है। जो सक्षम हैं वे अधिक देते हैं, जिससे जो नहीं दे सकते वे भी आ सकें। यही व्यवस्था चालीस वर्षों से चल रही है।
सुझाई गई राशि
किसी भी व्यक्ति को केवल इस कारण नहीं लौटाया जाता कि वह सहयोग नहीं कर सकता।
सहयोग की व्यवस्था समझेंआपका सहयोग किसमें लगता है
तिथि, नगर, स्थान और शेष स्थान — सब कुछ पहले से स्पष्ट। पोस्टर का इंतज़ार नहीं।
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६ शिविर






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संस्थापक
परम आनन्द जी चार दशकों से यह कह रहे हैं कि अधिकांश रोग शरीर की विफलता नहीं, उसके साथ किए गए व्यवहार का परिणाम हैं — और जो व्यवहार से बना है वह व्यवहार से ही बदल सकता है।
उनका शिविर उपदेश नहीं देता। वह सात दिन तक एक दिनचर्या जीकर दिखाता है, ताकि लौटने के बाद व्यक्ति स्वयं उसे निभा सके। "अपने डॉक्टर स्वयं बनें" उनका सबसे दोहराया गया वाक्य है।
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