
शरीर की भागवत
- तिथि
- ४–११ अक्टूबर २०२६
- स्थान
- श्री माहेश्वरी भवन, श्री गंगानगर
परम आनन्द जी
बिना दवा के — मोटापा, डायबिटीज, एसिडिटी, बीपी, थायराइड और जोड़ों के दर्द से राहत की दिशा में एक ७ दिवसीय आवासीय शिविर। आहार ही औषधि है।
शिविर आपकी अपनी सहयोग राशि से — कोई निश्चित शुल्क नहीं

अगला शिविर
४–११ अक्टूबर २०२६
श्री माहेश्वरी भवन, श्री गंगानगर
प्रवेश यहाँ से
शिविर में जिन १३ व्याधियों पर विशेष रूप से कार्य होता है। अपनी स्थिति चुनिए और जानिए कि आहार-आधारित पद्धति उस पर कैसे काम करती है।
शिविर कैलेंडर
तिथि, नगर, स्थान और शेष स्थान — सब कुछ पहले से स्पष्ट। पोस्टर का इंतज़ार नहीं।





विधि
शरीर स्वयं को ठीक करना जानता है। हमारा कार्य केवल इतना है कि हम उसमें बाधा डालना बंद करें — और उसे वह दें जिसकी उसे वास्तव में आवश्यकता है।
पूरी विधि पढ़ें“शरीर ही हमारा मंदिर है, इसे समझें और स्वस्थ रखें।”
परम आनन्द जी
अब तक
प्रदर्शन-संस्करण
फाउंडेशन
आहार, उपवास और दिनचर्या — शरीर को स्वयं ठीक होने का अवसर देने की पद्धति।
देखें७ दिन का आवासीय शिविर, जहाँ यह पद्धति सिखाई नहीं — जी कर देखी जाती है।
देखेंप्रवचन, लेख और सत्संग — शिविर के बाद भी मार्गदर्शन बना रहे।
देखेंअन्नदान, पौधारोपण और सामुदायिक स्वास्थ्य — शिविर के बाहर का कार्य।
देखेंअनुभव
ये व्यक्तिगत अनुभव हैं। परिणाम हर व्यक्ति में भिन्न होते हैं।
सात दिन में सबसे बड़ा अंतर यह आया कि सुबह उठते ही भारीपन नहीं रहता। खाने का समय बदला, और नींद अपने आप सुधर गई।
शिविर में प्रतिदिन शर्करा नापी जाती थी, इसलिए अंदाज़े की जगह आँकड़ा सामने था। लौटकर मैंने अपनी रिपोर्ट अपने डॉक्टर को दिखाई और आगे का निर्णय उन्हीं के साथ लिया।
बीस साल से जेब में गोली रखता था। रात का भोजन जल्दी करने भर से जो अंतर आया, उसकी मुझे कल्पना नहीं थी।
सबसे अच्छी बात यह लगी कि किसी ने दवा छोड़ने को नहीं कहा। जो कहा गया वह था — अपने शरीर को देखना सीखिए।
घुटनों के कारण सीढ़ियाँ चढ़ना कठिन था। सूक्ष्म व्यायाम और भोजन में बदलाव — दोनों साथ चले, और तीन महीने में फ़र्क़ दिखा।
आश्रम में गंगा किनारे के सात दिन — मौन, प्राणायाम और सादा भोजन। मन का बोझ भी उतरा।

संस्थापक
परम आनन्द जी चार दशकों से यह कह रहे हैं कि अधिकांश रोग शरीर की विफलता नहीं, उसके साथ किए गए व्यवहार का परिणाम हैं — और जो व्यवहार से बना है वह व्यवहार से ही बदल सकता है।
उनका शिविर उपदेश नहीं देता। वह सात दिन तक एक दिनचर्या जीकर दिखाता है, ताकि लौटने के बाद व्यक्ति स्वयं उसे निभा सके। "अपने डॉक्टर स्वयं बनें" उनका सबसे दोहराया गया वाक्य है।
शिविर का एक दिन
शिविर में आने से पहले सबसे बड़ा प्रश्न यही होता है — वहाँ होगा क्या? पूरा दिनक्रम यहाँ है।
शरीर की वर्तमान स्थिति समझना
शेष ४ दिन शिविर पृष्ठ पर
शंका समाधान
सहयोग
शिविर आपकी अपनी सहयोग राशि से चलता है। जो सक्षम हैं वे अधिक देते हैं, जिससे जो नहीं दे सकते वे भी आ सकें। यही व्यवस्था चालीस वर्षों से चल रही है।
सुझाई गई राशि
किसी भी व्यक्ति को केवल इस कारण नहीं लौटाया जाता कि वह सहयोग नहीं कर सकता।
सहयोग की व्यवस्था समझेंआपका सहयोग किसमें लगता है
ज्ञान

क्या खाना है इस पर हज़ार सलाहें मिलती हैं। कब खाना है, इस पर लगभग कोई नहीं बोलता — जबकि शरीर पर उसका असर अधिक है।
१८ अगस्त २०२६६ मिनट

उपवास परंपरा में भी है और शरीर-विज्ञान में भी। दोनों एक ही बात कहते हैं — पाचन तंत्र को अंतराल चाहिए।
३० जुलाई २०२६८ मिनट

परम आनन्द जी के एक सत्संग से — शरीर के प्रति दृष्टि बदलने पर आहार अपने आप बदल जाता है।
१२ जुलाई २०२६५ मिनट
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जब भी आपके नगर के निकट कोई शिविर घोषित हो, आपको सबसे पहले पता चले।
यह प्रदर्शन-संस्करण है — यह फ़ॉर्म अभी कहीं नहीं भेजा जाता।